काया का पिंजरा डोले रे,
दोहा – कबीर कुआ एक है,
पनिहारी अनेक,
बर्तन सब के न्यारे न्यारे,
पानी सब में एक।
कबीर कमाई आपनी,
कबहूँ ना निष्फल जाय,
सात समुंद्र आड़ा पड़े,
मिले अगाऊ आय।
काया का पिंजरा डोले रे,
सांस का पंछी बोले रे।।
तन नगरी मन मंदिर है,
परमात्मा इसके अंदर है,
दो नैन असंख्य समुन्द्र है,
पापी पाप को धोले रे,
काया का पिंजरा डोलें रे,
सांस का पंछी बोले रे।।
आने के साक्षी जाना है,
और जाने से क्या घबराना है,
ये दुनिया मुसाफिर खाना है,
तू जाग जगत ये सोले रे,
काया का पिंजरा डोलें रे,
सांस का पंछी बोले रे।।
कर्म अनुसारी फल ले रे,
और मनमानी अपनी करले रे,
तेरा घमंड सारा झडले रे,
अभिमानी मान क्यूँ डोलें रे,
काया का पिंजरा डोलें रे,
सांस का पंछी बोले रे।।
मात पिता भाई बहन पति पत्नी,
कोई नहीं तू किसी का रे,
कह कबीर झगड़ा जीते जी का,
अब मन ही मन क्यूँ डोलें रे,
काया का पिंजरा डोलें रे,
सांस का पंछी बोले रे।।
काया का पिंजरा डोलें रे,
सांस का पंछी बोले रे।।
Singer – Nand Lal Ji Bhat
Upload – Gopi Chand Suthar
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