सखी री राधा वल्लभ से,
हमारी लड़ गयी अंखियाँ,
बचायी थी बहुत लेकिन,
निगोड़ी लड़ गयी अखियाँ।।
ना जाने क्या किया जादू,
ये तकती रह गयी अखियाँ,
चमकती हाय बरछी सी,
कलेजे गड़ गयी अखियाँ,
सखी री बांके बिहारी से,
हमारी लड़ गयी अंखियाँ।।
चहू दिश रस भरी चितवन,
मेरी आखों में लाते हो,
कहो कैसे कहाँ जाऊं,
यह पीछे पड़ गयी अखियाँ,
सखी री बांके बिहारी से,
हमारी लड़ गयी अंखियाँ।।
भले तन से ये निकले प्राण,
मगर यह छवि ना निकलेगी,
अँधेरे मन के मंदिर में,
मणि सी गड़ गयी अखियाँ,
सखी री बांके बिहारी से,
हमारी लड़ गयी अंखियाँ।।
सखी री राधा वल्लभ से,
हमारी लड़ गयी अंखियाँ,
बचायी थी बहुत लेकिन,
निगोड़ी लड़ गयी अखियाँ।।
स्वर – अभिषेक तिवारी जी।
प्रेषक – ओमप्रकाश पांचाल उज्जैन मध्य प्रदेश।
9926652202








