पतित पावनी मोक्ष दायनी,
दोहा – जटा खुली महादेव की,
छूटा वेग अपार,
अमृत बन धरती चली,
पतितन का उद्धार,
हस्त योग दशमी तिथि,
प्रगटी देव स्वरूप,
पाप ताप सब दूर हो,
जय मां गंगान अनूप।
हर हर गंगे जय मां गंगे,
हर हर गंगे जय मां गंगे,
पतित पावनी मोक्ष दायनी,
दुखों को हरने वाली,
त्रिपथ गामिनी सुरसरी मैया,
पतितो को तारने वाली।bd।
विष्णु के चरणों से निकली,
ब्रह्मा के कमंडल में समाई,
देवलोक की परम धरोहर,
धरा धाम पर तुम हो आई,
भगीरथ की कठिन तपस्या,
सफल हुई उस पावन पल में,
स्वर्ग लोक से उतर के मैया,
आई तुम इस भूमंडल में,
हर हर गंगे जय मां गंगे,
हर हर गंगे जय मां गंगे।।
वेग तुम्हारा सह न सकी जब,
व्याकुल हुई यह धरती सारी,
तब जटा खोल शिव शंकर ने,
महिमा अद्भुत की थी न्यारी,
शांत किया अभिमान लहर का,
शिव की जटा में आसन पाया,
फिर शिव की एक अलख खुली तो,
अमृत रस धरती पर आया,
हर हर गंगे जय मां गंगे,
हर हर गंगे जय मां गंगे।bd।
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी का दिन है,
हस्त नक्षत्र का योग निराला,
पापों का संहार करन को,
प्रगटा है यह अमृत काला,
दस पापों को हरने वाली,
तुम हो मां कलयुग कल्याणी,
एक डुबकी जो श्रद्धा से मारे,
तर जाए उसकी जिंदगानी,
हर हर गंगे जय मां गंगे,
हर हर गंगे जय मां गंगे।bd।
गंगा मैया लहर तुम्हारी,
कष्ट हमारे दूर भगाए,
जो भी गाए महिमा तेरी,
वो मन वांछित फल को पाए,
जय भगीरथी जय सुरसरी,
चरण पड़े जो तेरी मैया,
पा जाए वो भव से किनारा,
हर हर गंगे जय मां गंगे,
हर हर गंगे जय मां गंगे।।
By – Team Bhajan Diary








