कई खेल्या कई खेलसी,
दोहा – आया है सो जावसी,
राजा रंक फकीर,
एक सिंहासन चढ चले,
एक बंधे जंजीर।
कई खेल्या कई खेलसी,
कई खैल सिधाया ऐ,
सखी ईण आंगणिये में ऐ।।
आवो मेरी पांचों बहनो,
सिंदयो चोलो ऐ,
मै अबला हरी नाम की,
मेरो बालम भोलो ऐ,
सखी ईण आंगणिये में ऐ।।
एक निवाणी दूजी काबरी,
तीजी भोली ऐ,
नैण हमारा ज्यूं झूरे,
जियां गागर फुटी ऐ,
सखी ईण आंगणिये में ऐ।।
नैजा उतारया हरिये बाग में,
साथी कुरलाया ऐ,
थे जावो घर आपणे,
म्हे तो होया पराया ऐ,
सखी ईण आंगणिये में ऐ।।
काजी मोहम्मद यूं भणे,
सखी यहां नही रैणा ऐ,
आया परवाना हरी नाम का,
सखी जाणां होग्या ऐ,
सखी ईण आंगणिये में ऐ।।
कई खेल्यां कई खेलसी,
कई खैल सिधाया ऐ,
सखी ईण आंगणिये में ऐ।।
गायक – विशाल कविया।
प्रेषक – समुन्द्र चेलासरी।
मो.- 8107115329








