साधु भाई नगे करो वा घर की,
आदु वास अंत नहीं वहां का,
काया होवे बज्र की।।
ना कोई नीव सीव नई छाजा,
ना दीवार पत्थर की,
ना कोई धातु चुनावट कीनी,
नहीं कला है कारीगर की।।
धरण पर कोई ध्यान मत दीजिए,
ना है बात अंबर की,
चौदह लोक नौ खंड में नाही,
ना है सातों शायर की।।
ना कोई दीप ज्योति नहीं चमके,
किरणा नहीं चांद सूरज की,
ना कोई ब्रह्मा ना कोई विश्णु,
नहीं छवी है शंकर की।।
एक अरुपी ऊण माई बेठा,
नहीं काया औधर की,
ना कोई नाम रूप आकारा,
नहीं मात्रा अक्षर की।।
ना कोई रंग वरण नहीं कोई,
ना पहचान सूरत की,
ऊण घर की कोई गम नहीं जाने,
कोई कोई बिरला फरकी।।
अजब गजब अखंड उजियारा,
लीला पारब्रह्म की,
ऊण घर ने कोई ओलक लेवे,
मिले उपाधि अमर की।।
बुध पुरी जी गुरुदेव कृपालु,
अरज सुनो दुर्बल की,
भैरु गाडरी शरणे आपके,
मेहर बड़ी गुरुवर की।।
साधु भाई नगे करो वा घर की,
आदु वास अंत नहीं वहां का,
काया होवे बज्र की।।
स्वर – भैरू राम गाडरी महाराज।
9376002000








