उधव कर्मन की गति न्यारी,
कैसे लिखूं रे मुरारी,
उधव कर्मण की गत न्यारी।।
नागर बेल फ़ूल बिना तरसै,
तूम्बा लगत हजारी,
निपुत्र नार पुत्र बिना तरसै,
सूरी जण-जण हारी,
उधव कर्मण की गत न्यारी।।
वैश्या ओढे शाल दुसाला,
पतिव्रता फिरत उघाड़ी,
मृग नाभि रे माही है किस्तुरी,
भटकयो फिरत उजाड़ी,
उधव कर्मण की गत न्यारी।।
गर्व कियो रतनागर सागर,
नीर खारो कर डारी,
गर्व कियो उन वन री चिरमली,
मुंह से कर दी कारी,
उधव कर्मण की गत न्यारी।।
गर्व कियो उन चकवे चकवी,
रैन बिछैवा कर डारी,
सूरदास प्रभु उमर भजन मे,
राखो लाज हमारी,
उधव कर्मण की गत न्यारी।।
उधव कर्मन की गति न्यारी,
कैसे लिखूं रे मुरारी,
उधव कर्मण की गत न्यारी।।
गायक – रामनिवास जी राव।
प्रेषक – समुन्द्र चेलासरी।
मो. – 8107115329








