सारे जगत को खिला रहे हो,
तुम फिर भी माखन चुरा रहे हो,
लीला ये कैसी रचा रहे हो,
तुम फिर भी माखन चुरा रहे हो,
लीला ये कैसी रचा रहे हो,
तुम फिर भी माखन चुरा रहे हो।।
तर्ज – तेरा सिंहासन क्यों हिल रहा है।
हमको दिए है सब सुख जहां के,
धन्ना का हल खुद चला रहे हो,
लीला ये कैसी रचा रहे हो,
सारें जगत को खिला रहे हो,
तुम फिर भी माखन चुरा रहे हो।।
खुद नाचते हो भजनों की धुन पे,
खुद नाचते हो भजनों की धुन पे,
मुरली पे जग को नचा रहे हो,
लीला ये कैसी रचा रहे हो,
सारें जगत को खिला रहे हो,
तुम फिर भी माखन चुरा रहे हो।।
वो भी उतारे नजर तुम्हारी,
हम सब उतारे नजर तुम्हारी,
जिन्हें बुरी नजर से बचा रहे हो,
लीला ये कैसी रचा रहे हो,
सारें जगत को खिला रहे हो,
तुम फिर भी माखन चुरा रहे हो।।
पोंछे है तुने ‘रोमी’ के आंसू,
पोंछे हैं तुने रोमी के आंसू,
खुद अपने आंसू छुपा रहे हो,
लीला ये कैसी रचा रहे हो,
सारें जगत को खिला रहे हो,
तुम फिर भी माखन चुरा रहे हो।।
सारे जगत को खिला रहे हो,
तुम फिर भी माखन चुरा रहे हो,
लीला ये कैसी रचा रहे हो,
तुम फिर भी माखन चुरा रहे हो,
लीला ये कैसी रचा रहे हो,
तुम फिर भी माखन चुरा रहे हो।।
स्वर – सरदार रोमी जी।
प्रेषक – ओमप्रकाश पांचाल।
उज्जैन मध्य प्रदेश।








