मेरे गुरुवर तेरी महिमा गरिमा,
कैसे गाऊं कैसे ध्याऊं,
ऊंची तेरी साधना।।
तर्ज – मेरे महबूब क़यामत।
जीवन ऐसा जी कर दिखाया,
रत्नत्रय को मन में बसाया,
दर्शन तेरा आकर्षण देता,
निर्बल को भी संबल देता,
उत्तम थे गुरु सर्वोत्तम थे,
ये मैनें नहीं सबने देखा,
जो कहा करते थे,
उन्हें वहीं करना,
कैसे गाऊं कैसे ध्याऊं,
ऊंची तेरी साधना।।
सरल था जीवन चिंतन ऊंचा,
समत्ता भावों से सबको खींचा,
उनके लिए न कोई ऊंचा-नींचा,
मसीहा गुरुवर जन-जन के थे,
तब ही कायल थे सब नर-नारी,
शांत रहे थी,
चाहे महावेदना,
कैसे गाऊं कैसे ध्याऊं,
ऊंची तेरी साधना।।
चरणों में गुरुवर के वंदन हमारा,
आज है जो भी वो सब तुम्हारा,
तुझसा संयमित हो संयम हमारा,
तेरे नक्शे कदम पर चल करके,
पाना वो अक्षय पद पावन,
गुरु प्रेमसुख की,
राह पे चलना,
कैसे गाऊं कैसे ध्याऊं,
ऊंची तेरी साधना।।
मेरे गुरुवर तेरी महिमा गरिमा,
कैसे गाऊं कैसे ध्याऊं,
ऊंची तेरी साधना।।
लेखक – डॉ. साध्वी श्री अक्षिता जी महाराज।
गायिका – कुमारी सुप्रभा बाडोर।








