हे शिव शंकर हे डमरू धर,
सुन लो करुण पुकार,
करूं मैं विनती बारंबार,
करूं मैं विनती बारंबार।।
शीश पे तेरे गंग विराजे,
मस्तक पे तेरे चंदा साजे,
गल सर्पों की माल भयंकर,
नंदी के असवार,
करूं मैं विनती बारंबार,
करूं मैं विनती बारंबार।।
बैठे तुम तो ध्यान लगाए,
भक्त तेरे यहां आस लगाए,
कब सुध लोगे भोले हमारी,
देख लो बस एक बार,
करूं मैं विनती बारंबार,
करूं मैं विनती बारंबार।।
तुम तो हो प्रभु अंतर्यामी,
सकल जगत के हो तुम स्वामी,
हाल मेरा कब तुमसे छिपा है,
अब ना करो इनकार,
करूं मैं विनती बारंबार,
करूं मैं विनती बारंबार।।
हर हर भोले ‘यशिका’ जिसने पुकारा,
तुमने उसका संकट टारा,
कष्ट मेरे भी हर लो बाबा,
‘टोनी’ खड़ा तेरे द्वार,
करूं मैं विनती बारंबार,
करूं मैं विनती बारंबार।।
हे शिव शंकर हे डमरू धर,
सुन लो करुण पुकार,
करूं मैं विनती बारंबार,
करूं मैं विनती बारंबार।।








