मन ममता को मारिये,
दोहा – किण तन का दिवला करूं,
बाती मेलूं घीव,
लोही सिंचूं तेल ज्यूं,
म्हरो जद मुख देखूं पीव।
मन ममता को मारिये,
कर-कर ब्रह्मविचार म्हारी हेली ऐ।।
ब्रह्मभेद बिरला लखे,
तज भंवसागर भाव म्हारी हेली ऐ,
चित कर चाहत चानणो,
तिरे नाम चढ नाव म्हारी हेली ऐ,
मन ममता को मारीये।।
कोई चावे धर्म को,
कोई करे खोटा कर्म,
साधू चावे शब्द को,
जांस्यूं मिटज्य भर्म म्हारी हेली ऐ,
मन ममता को मारीये।।
शब्द ग्रहण सोई पार है,
भ्रम रैया सौई आर,
आत्म तंत नहीं ओलख्या,
गया जमारो हार म्हारी हेली ऐ,
मन ममता को मारीये।।
सतगुरु से सन्मुख सदां,
मिट रही कुलकाण,
बन्नानाथ उण संत को,
कबहू ना आवे हाण म्हारी हेली ऐ,
मन ममता को मारीये।।
मन ममता को मारीये,
कर-कर ब्रह्मविचार म्हारी हेली ऐ।।
👉 ये भी देखें – हेली म्हारी बाहर भटके काई।
🎤 गायक / Singer – समुन्द्र चेलासरी।
📜 प्रेषक / Upload By – मनीष कुमार लौट
☎️ संपर्क / Contact – 8107115329








