महलों में नहीं कुटिया में नहीं,
जहाँ याद करो भोलेनाथ वहीं,
जहां याद करो भोलेनाथ वहीं।।
क्यों पाप कमाके धन जोड़ा,
क्यों अपनों से रिश्ता तोड़ा,
सोने में नहीं चांदी में नहीं,
जहां याद करो भोलेनाथ वहीं,
महलों में नहीं कुटिया में नहीं,
जहां याद करो भोलेनाथ वही।।
क्यों छुपकर जोड़ रहा माया,
तुझे देख रहा हूं ऊपर वाला,
कंकड़ में नहीं पत्थर में नहीं,
जहां याद करो भोलेनाथ वहीं,
महलों में नहीं कुटिया में नहीं,
जहां याद करो भोलेनाथ वही।।
पाताल गगन और जल थल में,
भक्तों की सुनते पल भर में,
गंगा में नहीं यमुना में नहीं,
जहां याद करो भोलेनाथ वहीं,
महलों में नहीं कुटिया में नहीं,
जहां याद करो भोलेनाथ वही।।
यह सब भोले की माया है,
इसे कोई समझ नहीं पाया है,
जादू में नहीं टोना में नहीं,
जहां याद करो भोलेनाथ वहीं,
महलों में नहीं कुटिया में नहीं,
जहां याद करो भोलेनाथ वही।।
महलों में नहीं कुटिया में नहीं,
जहाँ याद करो भोलेनाथ वहीं,
जहां याद करो भोलेनाथ वहीं।।
स्वर – अंकुश जी महाराज।
प्रेषक – ओमप्रकाश पांचाल उज्जैन मध्य प्रदेश।
99266 52202








