राम रमैया म्हारो,
कृष्ण कन्हैयो,
हुंडी स्वीकारे,
म्हारो सांवरियो,
नट नागरियो।।
साधु आया रमता चार,
करी मसकरी भेजिया द्वार,
सब ही बोले यू नर नार,
इण तो नगरी में नरसी नागरियो,
म्हारो सांवरियो,
नट नागरियो।।
जूनागढ़ रा बाणियां,
अन्न देवे नहीं पाणिया,
साधु सांचा जाणिया,
दूर देशा रो नरसी आढ़तियो,
म्हारो सांवरियो,
नट नागरियो।।
रूपया लीना अपने हाथ,
हुंडी लिखदी उण रे साथ,
करो रसोई चावल भात,
धन तो संतो ने सारो बांट दियो,
म्हारो सांवरियो,
नट नागरियो।।
म्हारो सेठ तू घनश्याम,
हुंडी लिख दी तेरे नाम,
नरसी रो थाने प्रणाम,
जनम जनम रो थारो चाकरियो,
म्हारो सांवरियो,
नट नागरियो।।
साधु पूगा द्वारिका,
पुछ पुछ ने हारगा,
लोग हंसे सब द्वारिका झूठो,
नरसी ने झूठो सांवरियो,
म्हारो सांवरियो,
नट नागरियो।।
काम पड़ियो थारे सू आज,
नरसी री राखी जो लाज,
मूल रूपया दीजो ब्याज,
पहलो ही पहलो थासू काम पड़यो,
म्हारो सांवरियो,
नट नागरियो।।
सेठ बन आएं घनश्याम,
संतो सू किनो प्रणाम,
हुंडी बाची खुद रे नाम,
नरसी मेहता रो मैं तो हाजरियो,
म्हारो सांवरियो,
नट नागरियो।।
यू भगता रे बस में हरि,
संतो पर कृपा करी,
गावे थारो नरसी जी,
जुग जुग में भगता रे आयो सांवरियो,
म्हारो सांवरियो,
नट नागरियो।।
राम रमैया म्हारो,
कृष्ण कन्हैयो,
हुंडी स्वीकारे,
म्हारो सांवरियो,
नट नागरियो।।
स्वर – डॉ. श्री रामप्रसाद जी महाराज।








