गुरु बिन जीव भरम में डोलें,
चौरासी में खावें भचेडा,
हिवडे पाट कूण खोलें।।
गुरु सम देव जगत में ना दूजा,
गाल तराजू में तोलें,
भूल्या जीव ने राय बतावे,
ज्ञान भसोली छोले।।
ब्रम्हाजी का पूत्र मूनि नारद,
बडा बोल मुख बोलें,
चार दिनों तक फिरे भटकता,
तिरें कालु किर के ओले।।
देवी देवता पीर पेगंबर,
बृह्मा विष्णु भोले,
गुरु शरण को लियो आसरों,
सहजा मुक्ति होले।।
घीसा राम जी सांची केवे,
क्यों भटकतो डोलें,
सतगुरु के बीना पार नहीं होवे,
बीरम राम यूं बोले।।
गुरु बिन जीव भरम में डोलें,
चौरासी में खावें भचेडा,
हिवडे पाट कूण खोलें।।
गायक – खेमजी भुनाभाई।
प्रेषक – प्रवीण सिंह रुदलाई।
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