सुणले री काली माई,
इतनी क्यौं छोह म्ह आई,
गौरख स मेरा नाम,
रहणदे क्यौं टकरावै।।
तर्ज – अब ना छूपाऊंगा।
कजली बण म्ह करुं बसेरा,
तप भगती का कर्म स मेरा,
आकै नै क्यों धमकाया,
तेरा बता के ठाया,
गुस्से नै ले थाम,
रहणदे क्यौं टकरावै,
गौरख स मेरा नाम,
रहणदे क्यौं टकरावै।।
हटले दूर ना आवै नेड़ै,
कर लेण दे मनै भजन ना छेड़ै,
चिमटा ना मेरा हाल्लै,
जोर ना तेरा चाल्लै,
देणे ना तेरे दाम,
रहणदे क्यौं टकरावै,
गौरख स मेरा नाम,
रहणदे क्यौं टकरावै।।
अम्बर धरती पाताल हिलादूं,
मान जा ना खेल दिखादूं,
लाऊं ना पल की देरी,
पेस ना चाल्लै तेरी,
कर दूंगा इसा काम,
रहणदे क्यौं टकरावै,
गौरख स मेरा नाम,
रहणदे क्यौं टकरावै।।
सुण-सुण क नै बात पुराणी,
पड़गी कलम हाथ म ठाणी,
याणे नै पड़ग्या ढाला,
शोंक ना दूजा पाल्या,
कुड़लण तीर्थ धाम,
गजेन्द्र शीश झुकावै,
गौरख स मेरा नाम,
रहणदे क्यौं टकरावै।।
सुणले री काली माई,
इतनी क्यौं छोह म्ह आई,
गौरख स मेरा नाम,
रहणदे क्यौं टकरावै।।
लेखक – गजेन्द्र स्वामी कुड़लणीया।
9996800660
गायक – लक्की शर्मा पिचौलिया।
9034283904








