साथीड़ा केणो मान,
दोहा – चलती चाकी देख के,
दिया कबीरा रोय,
दो पाटो के बीच में,
साबुत बचे ना कोय।
चाकी चाकी सब कहे,
कीला कहे ना कोय,
जे कीला का सुमिरन करे,
बाल ना बांका होय।
साथीड़ा केणो मान,
भाईड़ा केणो मान,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
बिना रे पांखागो एक सुवटो रे,
उडियो जाव असमान,
पांख नही जांरे चोच नही,
कोनी काया रो आधार,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
बायड़ो सोनो कोनी निपजै रे,
मोती लागे कोनी डाल,
रूप उधारो बीरा ना मिले रे,
मांग्यो आव कोनी काम,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
हाड हटया रे गोडा टुटग्या रे,
सिर पर आग्या धोला बाल,
नैणा वालो नीर ढलत आयो रे,
अब थारे क्यांरो है गुमान,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
ओ भवसागर उंडो घणो रे,
नदियां बहे अपरम्पार,
दास डूंगरपुरी बोलिया रे,
हरी भज उतरो परली पार,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
साथीड़ा केणो मान,
भाईड़ा केणो मान,
ऐ दिनड़ा थारा चाल्या रे,
नारायण भजले राम।।
गायक – विशाल कविया।
प्रेषक – समुन्द्र चेलासरी।
मो. – 8107115329








