म्हारे घर के द्वारे पे,
लिख्यो थारो नाम है,
हारे को सहारो तू ही,
म्हारी पहचाण है।।
गाँव गलीडा माई,
सबने ख़बर है,
थारी दया की रोटी,
खावे म्हारो घर है,
म्हारे घर का टाबरिया भी,
लेवे थारो नाम है,
हारे को सहारो तू ही,
म्हारी पहचाण है।bd।
खुशियाँ का आँगणा में,
म्हाने तू खिलायो है,
लायक़ नहीं चरणा के,
सिर पे बिठायो है,
थारे नाम की किरपा से,
बणे सारा काम है,
हारे को सहारो तू ही,
म्हारी पहचाण है।।
माता पिता भी बाबा,
थारा गुण गावे है,
थारी झलक दिखजावे,
जद मुस्कावे है,
‘कपिल’ को यो जीवन बाबा,
थारो एहसान है,
हारे को सहारो तू ही,
म्हारी पहचाण है।bd।
म्हारे घर के द्वारे पे,
लिख्यो थारो नाम है,
हारे को सहारो तू ही,
म्हारी पहचाण है।।
स्वर – संजय मित्तल जी।








