किना क्यों नहीं ब्रज रा मोर,
दोहा – सोरठ जबही गांविये,
सबसु बड़ी राग,
ऐ ग्यानी वे तो उठ सुणे वो,
से गाफल नीन्द गुराय।
रागन में सौरठ बड़ी,
और भोजन में बड़ी खीर,
हे नाम बड़ों रघुनाथ रो,
हे स्नान बड़ों गन्गा तीर।
सौरठ महला उतरी,
झालर रे झंणकार जी,
हे धूजे गड रा कागला,
ऐ धूजे गड गिरनार।
किना क्यों नहीं ब्रज रा मोर,
ओ सांवरिया म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर,
ओ बनवारी म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर।।
वन में ही रहता गिरधर,
वन फल खाता रे,
ओ वन माही करता किलोल,
हे हे हे हे हे हे हे,
हे वन माही करता किलोल,
हे सांवरिया म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर,
ओ बनवारी म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर।।
मात जसोदा म्हाने,
चुगो रे चुगाती रे,
हो भर भर सोहन कटोर,
हे हे हे हे हे,
हो भर भर सोहन कटोर,
हे सांवरिया म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर,
ओ बनवारी म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर।।
हे पंख पड़े तो म्हारी,
मोहन उठावे रे,
हे टांके वारी मुकुट री ठोड़,
हे हे हे हे हे,
हे टांके वारी मुकुट री ठोड़,
हे सांवरिया म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर,
ओ बनवारी म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर।।
नंद बाबारी गलियां,
रंग री रऴिया रे,
हे जठे बसें नन्द किशोर,
हे हे हे हे हे,
हो जठे बसें नन्द किशोर,
हे सांवरिया म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर,
ओ बनवारी म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर।।
बोले बाई मीरा सांवरा,
गिरधर रा गुण रे,
हो मरुधर देश कठोर,
हे हे हे हे हे,
हो मरुधर देश कठोर,
हे सांवरिया म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर,
ओ बनवारी म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर।।
किना क्यों नहीं ब्रज रा मोर,
ओ सांवरिया म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर,
ओ बनवारी म्हाने,
किना क्यू नहीं ब्रिज रा मोर।।
स्वर – श्याम दास जी वैष्णव।
प्रेषक – कुलदीप सिंह ओसियां।
9468586253








