जिस माटी में जन्म लिया,
उस माटी में मिल जाएगा,
कर ले प्राणी राम भजन,
नहीं अंत समय पछताएगा।।
जोड़ जोड़ कर रखा कमाया,
साथ नहीं कोई ले जा पाया,
साथ नहीं कोई ले जा पाया,
क्या तेरा क्या मेरा प्यारे,
छूट यही सब जाएगा,
करलें प्राणी राम भजन,
नहीं अंत समय पछताएगा।।
नींद निरंतर मोह की सोया,
धन यौवन और बचपन खोया,
धन यौवन और बचपन खोया,
बीत रही है तेरी जवानी,
और समझ कब आएगा,
करलें प्राणी राम भजन,
नहीं अंत समय पछताएगा।।
मैं मेरा और तेरा करता,
नित्य पाप की गठरी भरता,
नित्य पाप की गठरी भरता,
जन ‘अंकुश’ कर राम भजन,
नहीं राम तजे सुख पाएगा,
करलें प्राणी राम भजन,
नहीं अंत समय पछताएगा।।
जिस माटी में जन्म लिया,
उस माटी में मिल जाएगा,
करले प्राणी राम भजन,
नहीं अंत समय पछताएगा।।
स्वर – श्री अंकुश जी महाराज।
प्रेषक – ओमप्रकाश पांचाल उज्जैन मध्य प्रदेश।
9926652202








