जीव सेलानी रे,
ओ मलजी जीव सेलानी रे,
या मनक जनम री मौज,
फेर पाछी नहीं आनी रे।।
यो भंवरो अमरिया को वासी,
एक दिन हंसो यो उड़ जासी,
देखत ही देखत रह जासी,
पाछो हाथ कदी नही आसी,
असी न जाणी रे,
ओ मल जी असी न जाणी रे,
या मनक जनम री मौज,
फेर पाछी नहीं आनी रे।।
नदी नीर जु बहतो जावे,
श्वास गयोड़ा कदी ना आवे,
दिन बितया पाछा नही आवे,
पल पल महंगी फेर न पावे,
आणी न जाणी रे,
बगत या आणी न जाणी रे,
या मनक जनम री मौज,
फेर पाछी नहीं आनी रे।।
पानी में धुबिया ज्यु प्यासा,
पानी में मछुवा ज्यू प्यासा,
पानी में पत्थर ज्यु प्यासा,
प्यास ही प्यास में गुट गई स्वासा,
गई जिंन्दगानी रे,
अमोलक गई जिंन्दगानी रे,
या मनक जनम री मौज,
फेर पाछी नहीं आनी रे।।
जिंन्दगानी माटी की हांडी,
जिंन्दगानी सपना की लाडी,
जिंन्दगानी पत्थर की गाड़ी,
जिंन्दगानी फूलों की बाड़ी,
या कुमलानी रे,
आखिर कुमलानी रे,
या मनक जनम री मौज,
फेर पाछी नहीं आनी रे।।
हरि भजन कर पावन होले,
परहित लाग परम पद पाले,
मात-पिता गुरु सेवा कर ले,
गुरु ज्ञान घट घट में भर ले,
गुर मुख वाणी रे दयाल जी,
गुर मुख बानी रे,
या मनक जनम री मौज,
फेर पाछी नहीं आनी रे।।
जीव सेलानी रे,
ओ मलजी जीव सेंलानी रे,
या मनक जनम री मौज,
फेर पाछी नहीं आनी रे।।
प्रेषक – कमलेश सुथार।
9414910004








