ध्याऊँ तोहे पवन सुत प्यारे,
माता अंजनी के दुलारे,
आज्यों आज सभा के माय,
विघ्न सब दूर भगाओ जी।।
धन धन महावीर हनुमंता,
सागर कूद गयो गढ लंका,
मन में रति ना राखी शंका,
मान रावण को मार्यो जी,
आज्यों आज सभा के माय,
विघ्न सब दूर भगाओ जी।।
शक्ति बाण लखन के लाग्यो,
लेबा संजीवन ने भाग्यो,
पता जब बुटी का नहीं पाया,
उठा पर्वत ने लायो जी,
आज्यों आज सभा के माय,
विघ्न सब दूर भगाओ जी।।
निशाचर मेघनाथ बलकारी,
जासे हार इंद्र ने मानी,
जाकि लंका जाय जलाई,
कालजों थासु कांपे जी,
आज्यों आज सभा के माय,
विघ्न सब दूर भगाओ जी।।
किन्ही अहिंरावण चतुराई,
ले गयो राम लखन दो भाई,
तू ही पाताल लोक के माय,
रूप देवी को धार्यो जी,
आज्यों आज सभा के माय,
विघ्न सब दूर भगाओ जी।।
सीता राम अयोध्या आए,
नर नारी मन में हर्षाये,
घर-घर घी के दीप जलाए,
कथा कर हिरालाल यश गाये,
दास चरणा को चाकर जी,
आज्यों आज सभा के माय,
विघ्न सब दूर भगाओ जी।।
ध्याऊँ तोहे पवन सुत प्यारे,
माता अंजनी के दुलारे,
आज्यों आज सभा के माय,
विघ्न सब दूर भगाओ जी।।
प्रेषक – रवि कुमार साहु।
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