बसो मोरे नैनन में घनश्याम,
दोहा – जैसे नदिया सागर में,
खोती अपना नाम,
वैसे ही मोरे नैनन में,
बस गए है घनश्याम।
नैनन द्वारे खोल के बैठी,
मैं तो सवेरे शाम,
बसो मोरे नैनन में घनश्याम,
रहो मोरे नैनन में घनश्याम।।
इस जीवन की हर एक सांसे,
इस जीवन की हर एक सांसे,
लिख दी है तेरे नाम,
सांवरिया,
बसों मोरे नैनन में घनश्याम।।
जीवन धन मोरे प्राण आधारे,
जीवन धन मोरे प्राण आधारे,
सुख दुःख चैन आराम,
सांवरिया,
बसों मोरे नैनन में घनश्याम।।
तेरे कारण गिरिधर नागर,
तेरे कारण गिरिधर नागर,
मै तो बिकी बिन दाम,
सांवरिया,
बसों मोरे नैनन में घनश्याम।।
छिन बैठूं छिन राह निहारूं,
छिन बैठूं छिन राह निहारूं,
मै तेरी आठों याम,
सांवरिया,
बसों मोरे नैनन में घनश्याम।।
नैनन द्वारे खोल के बैठी,
मैं तो सवेरे शाम,
बसों मोरे नैनन में घनश्याम,
रहो मोरे नैनन में घनश्याम।।
स्वर – स्वामी अशोकानंद महाराज जी।
प्रेषक – डॉ. एस.एस.सोलंकी।
Mob.9111337188








