शबरी के मेहमान पधारो,
शबरी के मेहमान।।
बिना प्रेम दुर्योधन के गृह,
छोड़ चले पकवान,
रूखे साग विदुर घर खायो,
प्रेम सहित सुख मान,
शबरी के मेहमान पधारों,
शबरी के मेहमान।।
द्रुपद सुता की लाज बचाई,
मध्य सभा में आय,
खींचत चीर दुशासन हारा,
चूर्ण कियो अभिमान,
शबरी के मेहमान पधारों,
शबरी के मेहमान।।
जल डूबत गजराज उबारे,
तात शब्द सुन कान,
सारथी बन पारथ रथ हाक्यों,
समर भूमि मैदान,
शबरी के मेहमान पधारों,
शबरी के मेहमान।।
गणिका गिद्ध अजामिल पापी,
तारे अधम महान,
‘भिक्षु’ अति है शरण तुम्हारी,
मीरा के भगवान,
शबरी के मेहमान पधारों,
शबरी के मेहमान।।
शबरी के मेहमान पधारो,
शबरी के मेहमान।।
स्वर – राजन जी महाराज।
प्रेषक – ओमप्रकाश पांचाल उज्जैन मध्य प्रदेश।
9926652202








