मैंने खाटू की गलियों में देखा,
वहां कण कण में श्याम बसा है,
यूँ ही लगता नहीं रोज मेला,
वहां कोई न कोई नशा है।।
तर्ज – ये तो प्रेम की बात है उधो।
प्रेमियों का दिखा ऐसा जमघट,
मैंने देखा न और कहीं पर,
नित भजनों की बहती है गंगा,
वहां करुणा की होती वर्षा है,
मैंने खाटु की गलियो में देखा,
वहां कण कण में श्याम बसा है।।
श्याम नाम का अमृत बरसता,
जिसे पीने को ये जग उमड़ता,
श्याम जादू चलाता है ऐसा,
वहां हर कोई जाकर फंसा है,
मैंने खाटु की गलियो में देखा,
वहां कण कण में श्याम बसा है।।
मैंने देखा है पल पल करिश्मा,
बनते देखा है पीतल को सोना,
सोइ किस्मत बदलते है देखा,
वहां भटके को मिलती दिशा है,
मैंने खाटु की गलियो में देखा,
वहां कण कण में श्याम बसा है।।
वहां सबसे बड़ी है अदालत,
देखा दुनिया का सबसे बड़ा जज,
“कमला” अर्ज़ी पूरी होते देखा,
वहां रोता हुआ भी हंसा है,
मैंने खाटु की गलियो में देखा,
वहां कण कण में श्याम बसा है।।
मैंने खाटू की गलियों में देखा,
वहां कण कण में श्याम बसा है,
यूँ ही लगता नहीं रोज मेला,
वहां कोई न कोई नशा है।।
गायिका – खुशबु राधा।
लेखक – राहुल शर्मा “कमला” बराकर, पश्चिम बंगाल।
संपर्क – 8637836102








