समझ मन राम नाम निज सार,
दोहा – मानुष नर तन पाय के,
कदे ना भजियो राम,
हीरो अनमोल रेत में,
रुलायो कोढी ग दाम।
रुलायो कोढी ग दाम,
रतन की कदर ना जानी,
फसयो बंदा मौह जाल में,
थारे मंडगी खेंचा तांणी।
समझ मन राम नाम निज सार,
बिना समझे तेरो धिरक जमारो,
पड़सी जमड़ां गी मार।।
मरणो जन्मणो चारुं खेणा,
लख चौरासी त्यार,
पशु पक्षी और सर्प कीट बण,
भोगे कष्ट अपार।।
जननी जायो मोह में फसायो,
बांधया बन्धन हजार,
उलझ-पुलझ जकड़यो विषय भोगां,
ज्यों मकड़ी गो तार।।
ध्रुव प्रहलाद मीरा गुण गायो,
तुलसी लियो रे आधार,
दास कबीर महामंत्र मान्यो,
मुड़ नही आया संसार।।
राम रटे सब पाप कटे,
बिना रटे डूबे मजधार,
बलवन्त बे नर पार उतरग्या,
ले शब्द टिकसार।।
समझ मन रामनाम निज सार,
बिना समझे तेरो धीरक जमारो,
पड़सी जमड़ा गी मार।।
गायक – समुन्द्र चेलासरी।
मो. – 8107115329
प्रेषक – मनीष कुमार लौट।








