मतलब के रिश्तों को तोड़ के प्यार की चाहत में मैं आया तेरे दरबार

मतलब के रिश्तों को तोड़ के,
प्यार की चाहत में,
मैं आया तेरे दरबार,
हर झूठ के रिश्ते से,
सही है, तुमसे नाता श्याम,
ये दिल से कहुं सरकार,
मैं आया तेरे दरबार,
मतलब के रिश्तो को तोड़ के।।

तर्ज – नफ़रत की दुनिया को छोड़ के।



अब सांवरे तुमसे,

एक बात कहनी है,
कब तक मुझे जग में,
हर घात सहनी है,
हर आदमी का आज बना है,
दुश्मन खुद इंसान,
ये कहता खुद संसार,
मैं आया तेरे दरबार,
मतलब के रिश्तो को तोड़ के।।



आंखें कहे दिल की,

जब लब खामोश हो,
ग़म छलके आंखों से,
जब दिल में रोष हो,
यहां कौन सुने मेरी सिवा अब,
तेरे लखदातार,
ये तुमसे कहूं करतार,
मैं आया तेरे दरबार,
मतलब के रिश्तो को तोड़ के।।



समझो सदा बाबा,

“जालान” को अपना,
ना टूटे बस मेरे,
ये जीवन का सपना,
आता रहूं मैं दर पे सदा ही,
ग्यारस को दरबार,
ये करम करो दातार,
मैं आया तेरे दरबार,
मतलब के रिश्तो को तोड़ के।।



मतलब के रिश्तों को तोड़ के,

प्यार की चाहत में,
मैं आया तेरे दरबार,
हर झूठ के रिश्ते से,
सही है, तुमसे नाता श्याम,
ये दिल से कहुं सरकार,
मैं आया तेरे दरबार,
मतलब के रिश्तो को तोड़ के।।

– भजन रचयिता –
पवन जालान जी।
94160-59499 भिवानी (हरियाणा)


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