जे तू पियाजी रे लाडली,
पिव अपना कर लीजे,
कळा कल्पना मेट ने,
चित चरनो में लीजे,
जे तू पियाजी रे लाड़ली रे।।
मार्ग पियाजी रो कठिन घणो,
भेवनो खोंडे वाली धारा,
डिंगमिंगे सो गिर पड़े,
ऊतरे नहीं पारा,
जे तू पियाजी रे लाड़ली रे।।
मार्ग पियाजी रो सुगम घणो,
तेरी चाल रे अनाड़ी,
नाचण ना जाने बावली,
केवे आँगन टेडो,
जे तू पियाजी रे लाड़ली रे।।
जे तू नाचण निसरी,
घुंघट पट केसा,
घुंघट रो पट मत खोल दे,
मत राख अनेसो,
जे तू पियाजी रे लाड़ली रे।।
मन चंचल चारों दिश भवे,
पतिव्रता केवावे,
सेवा मनावे जी आन री,
पीव कैसे पावे,
जे तू पियाजी रे लाड़ली रे।।
पीव खोजत ब्रह्मा थकिया,
सुर नर मुनिजन देवा,
केवे कबीर सा धर्मीदास ने,
करो संतो री सेवा,
जे तू पियाजी रे लाड़ली रे।।
जे तू पियाजी रे लाडली,
पिव अपना कर लीजे,
कळा कल्पना मेट ने,
चित चरनो में लीजे,
जे तू पियाजी रे लाड़ली रे।।
गायक – किशन सिंह जी सोडा।
प्रेषक – प्रेम सिंह राजपुरोहित सोढ़ा।
बस्सी नगर (तिंवरी)
9602413337








