अधर अधर पग,
रखो म्हारी कुलदेवी।
दोहा – प्रथम विनायक को भजे,
प्रभु का ले फिर नाम,
कुलदेवी जयकार से,
शुरू करें सब काम।
सर्व सुमगल दायिनी,
हे कुलदेवी मात,
कुल तेरा तुझको भजे,
कर जोड़े दिन रात।
कुलदेवी आशीष से,
बनते बिगड़े काज,
निज कुल की मां जगत में,
रखती हरदम लाज।
अधर अधर पग,
रखो म्हारी कुलदेवी,
भगत बुलावे बेगा आओ मां,
हो अधर अधर पग,
रखो म्हारी बीसभुजा मां,
थोने सेवड़ बुलावे,
बेगा आओ मां,
बीसभुजा ने शस्तर सोवे,
सिंह की सवारी,
प्यारी लागे मां,
साठिका ओरण में,
झूलो मंडायो भगत,
झूला झुलावे बेगा,
आओ कुलदेवी मां,
अरे बेगा आओ म्हारी,
बीसहस्त माता,
सेवड़ बाटा जोवे मां,
बेगा आओ म्हारी,
बीसहस्त मैया,
राजपुरोहित बुलावे,
बेगा आओ मां।।
बीसभुजा ने शस्तर सोवे,
सिंह की सवारी प्यारी लागे मां,
रंग मतवालों बीसभुजा रो,
मुखड़े रो रूप निरालो मां,
हो बेगा पधारो म्हारी,
बिसहस्त मैया,
थोरे चमचम पायल बाजे मां।।
सोने री थोरे नथली चमके,
गले में नवसर हार म्हारी मां,
हाथों मेहंदी सोजत की राछे,
चुडलो प्यारो लागे कुलदेवी मां,
हे रमता पधारो,
कुल री देवी मां,
सेवड़ पुरोहित बाटा जोवे,
वेगा आवो धणियाणी मां।।
साठिका नगरी में,
बीसभुजा रो मंदिर,
मन ही मन मुस्कुरावे मां,
साठिका नगरी में,
बीस भुजा विराजे,
सेवड़ राजपुरोहित बुलावे मां,
अपने बधावे ओ कुल री देवी,
राखो छतर वाली छाया मां।।
कुलदीप सिंह ओसियां,
थोरी सेवा करें मां,
चरणों में शीश नचावे मां,
कुलदीप सेवड़ ओ तो,
अरज गुजारे मां,
हे सम्मुख रेवो धणियाणी मां,
हे कुलदेवी मां कृपा करजो,
हे लजिया राखो धणियाणी मां।।
सिंगर – रघु राणा डांडिया।
प्रेषक – कुलदीप सिंह राजपुरोहित ओसियां।
9468 586 253








