देखे कई दरबार पर,
खाटू जैसा प्यार,
कहीं और ना मिला,
वहाँ बैठे सरकार,
सुने सबकी पुकार,
कहीं और ना मिला।।
लगती है अदालत,
और होती सुनवाई,
तुम जाना जरूर,
आते दुखियारे,
सुनाते अपने मन की,
वो सुनते है जरूर,
करते सबके दुखड़े दूर,
देखे कई दरबार।।
छोड़े ये जमाना,
पर तू ना ठुकराना,
ओ खाटू वाले श्याम,
हाथ यूहीं रखना,
दया का मेरे सिर पे,
मैं आता रहूँ धाम,
बस गाऊँ श्याम श्याम,
देखे कई दरबार।।
थाम ली जो तुमने,
कलाई ये अनुज की,
वो हारा नहीं श्याम,
नाम से ही तेरे,
मिली है इस जग में,
उसे तो पहचान,
करे तेरा गुणगान,
देखे कई दरबार।।
देखे कई दरबार पर,
खाटू जैसा प्यार,
कहीं और ना मिला,
वहाँ बैठे सरकार,
सुने सबकी पुकार,
कहीं और ना मिला।।
स्वर – संजय मित्तल जी।
लेखक / प्रेषक – अनुज जैन।
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