अहो लड़ैती इतनी मोपे,
कृपा करो बलि जाऊँ,
जागत सोवत रटूं निरंतर,
राधा-राधा गाऊँ।।
हिय जिय रसना स्वांस स्वांस प्रति,
रोम रोम रटलाऊँ,
ज्यो लूँ नाम साँस तबही लूँ,
एकमेक है जाऊँ,
जागत सोवत रटूँ निरंतर,
राधा-राधा गाऊँ।।
नाम रुपमय रुप नाममय,
विविमय है दुलराऊँ,
पियत छकी मतवारी प्यासी,
पीवत हू न अघाऊँ,
जागत सोवत रटूँ निरंतर,
राधा-राधा गाऊँ।।
जान परे नहिं साँझ सवेरो,
ऐसे जनम बिताऊँ,
श्री हित बेग ढरो भोरी पे,
हुलसि हुलसि जस गाऊँ,
जागत सोवत रटूँ निरंतर,
राधा-राधा गाऊँ।।
रचना – श्री भोरी सखी जी।
स्वर – श्रीहित अम्बरीष जी।








