बुझने लगी है इन नैनो की ज्योति,
अंधेरे में छोड़ सारा धाम जा रहा है,
रोको रे रोको मेरा राम जा रहा है,
अवध को छोड़ सारा गाँव जा रहा है,
रोकों रे रोकों मेरा राम जा रहा हैं।।
तर्ज – रंगमहल के दस दरवाजे।
मेरे कोई नहीं है पास,
मेरा राम चला वनवास,
रह-रह के दिल में यही पश्चाताप होगा,
मुझ सा अभागा जग में कौन बाप होगा,
हुई बेदना जो सहन अब न होती,
सुखों का जो दामन धाम जा रहा है,
रोकों रे रोकों मेरा राम जा रहा हैं।।
मेरी टूट गई सब आस,
मेरा राम चला रे वनवास,
दिल में बसाई मैंने जो कैकेयी,
दुश्मन अवध की वो बन गई कैकेयी,
ममता मिली है उसे माँ की खोटी,
करने कठिन वो कैसा काम जा रहा है,
रोकों रे रोकों मेरा राम जा रहा हैं।।
किसको कष्टों का एहसास,
मेरा राम चला वनवास,
महलों का रहने वाला वन में रहेगा,
विपदा कठोर बेटा कैसे सहेगा,
भर-भर के सिसकी प्रजा खूब रोती,
घर-घर पुकारा जिसका नाम जा रहा है,
रोकों रे रोकों मेरा राम जा रहा हैं।।
मुझको पूरा है विश्वास,
मेरा राम चला रे वनवास,
दुःख जो मिलेंगे दिल पर जाएँगे झेले,
जग के विधाता अब तू मेरे प्राण ले ले,
कहें “चंदोलाला”मेरे मन का मोती,
सरेआम पे जा बिन दाम जा रहा है,
रोकों रे रोकों मेरा राम जा रहा हैं।।
बुझने लगी है इन नैनो की ज्योति,
अंधेरे में छोड़ सारा धाम जा रहा है,
रोको रे रोको मेरा राम जा रहा है,
अवध को छोड़ सारा गाँव जा रहा है,
रोकों रे रोकों मेरा राम जा रहा हैं।।
स्वर / प्रेषक – परशुराम उपाध्याय जी।
श्रीमानस-मण्डल।
वाराणसी- मो 9307386438








