ऐसी जम्भगुरू महिमा थारी,
कोई नर गावेला,
गावेला सोई नर पावेला,
ऐसी महिमा जम्भ गुरु थारी,
कोई नर गावेला।।
थारे सिर पर टोपी साजे,
गल में काली माला राजे,
भगवों भेष सुहाणो लागे,
जगमग जोत जगत है आगे,
सबद धुनी श्री मुख से,
आप सुणावेला,
ऐसी महिमा जम्भ गुरु थारी,
कोई नर गावेला।।
थारे चहूंदिश मुखड़ा दरशे,
छाया पेट पूठ नही दीसे,
मुख पर नूर सूर ज्यूँ बरसे,
दर्शन कर म्हारो हिवड़ो हरसे,
विष्णु विष्णु नाम रो,
जाप जपावेला,
ऐसी महिमा जम्भ गुरु थारी,
कोई नर गावेला।।
आसन समराथल पर भारी,
दर्शन पावे नर और नारी,
जिसमें ना कोई हल्का भारी,
जम्भ गुरू सबरा है हितकारी,
शरण पड़या रो बेड़ो,
पार लगावेला,
ऐसी महिमा जम्भ गुरु थारी,
कोई नर गावेला।।
‘सच्चिदानंद’ रा थे हो स्वामी,
घट घट वासी अंतर्यामी,
थारो पार न कोई पावे,
चाहे कोई कितरो ज़ोर लगावे,
सिर पर रखदो हाथ,
बात बण जावेला,
ऐसी महिमा जम्भ गुरु थारी,
कोई नर गावेला।।
ऐसी जम्भगुरू महिमा थारी,
कोई नर गावेला,
गावेला सोई नर पावेला,
ऐसी महिमा जम्भ गुरु थारी,
कोई नर गावेला।।
गायक – स्वामी सच्चिदानंद जी आचार्य।
प्रेषक – विष्णु लटियाल हाणियां।
9928412891








