सूराँ की धूल उड़ा दी रे,
यो नशो बडो बेईमान।।
हरदम पीवे चाय की घुटकी,
पीवे सिगरेट बजावे चुटकी,
गुटका खाय करे फुचकी,
पर नारी के कारणें,
जूता खाय बदनाम।
सूरा की धूल उडादी रे,
यो नशो बडो बेईमान।।
अमल तमाकु पीवे छूतरा,
मुर्गा बकरा काटे हत्यारा,
दारू पीय पड़ा गलियारा,
गहणू क्यारा सब बेच दिया,
घर में नही है धान।
सूरा की धूल उडादी रे,
यो नशो बडो बेईमान।।
बड़ा कष्ट सें धन कमावे,
मुर्ख वांको फूक गमावे,
तन के नाना रोग लगावे,
असर दवाई करे नही,
हाथां बिगाडी तान।
सूरा की धूल उडादी रे,
यो नशो बडो बेईमान।।
सकल नशां से हो जा न्यारा,
गुरू शरण में आजा प्यारा,
कर सत्संग होय भव पारा,
बिन चेतिया मूंडी होवसी,
सुवा चढने वाली है जान।
सूरा की धूल उडादी रे,
यो नशो बडो बेईमान।।
सूराँ की धूल उड़ा दी रे,
यो नशो बडो बेईमान।।
गायक – मनोहर परसोया।








