दिखा दे यार अब मुखड़ा,
घूंघट में क्यों छिपाया है,
हुस्न तेरे का है सानी,
ना दूजा मन में लजाया है।।
नज़ारा प्रेम का भरके,
लगाया है जिगर मेरे,
जुदाई का अभी परदा,
बीच में क्यों गिराया है,
दिखा दें यार अब मुखडा,
घूंघट में क्यों छिपाया है।।
तेरे मिलने की खातिर को,
हज़ारों लोक तरसावें,
खुले किस्मत बड़ी जिसकी,
वही दीदार पाया है,
दिखा दें यार अब मुखडा,
घूंघट में क्यों छिपाया है।।
नहीं है आस इस तन की,
ना धन की लालसा मुझको,
वो ‘ब्रम्हानंद’ दे दर्शन,
ये ही दिल में समाया है,
दिखा दें यार अब मुखडा,
घूंघट में क्यों छिपाया है।।
दिखा दे यार अब मुखड़ा,
घूंघट में क्यों छिपाया है,
हुस्न तेरे का है सानी,
ना दूजा मन में लजाया है।।
स्वर – रमेश जी दाधीच।
रचना – ब्रम्हानंद जी।








