कर लेणा खरी कमाई रे,
दोहा – कबीर कमाई आपणी,
कबुहन निष्फल जाए,
सौ कोसां पाछे धरे,
मिले अगाऊ आय।
धिन हो माता सुंदरी,
जिन जाया साधु पूत,
राम नाम की भक्ति करी,
बाकी गए सरुत।
करणी करो तो आच्छी करो,
बुरी विचारों नाय,
कसर पड़े ज्यू मत करो,
ओची उम्र माय।
कर लेणा खरी कमाई रे,
ले लेणा बहुत भलाई रे,
तेरा कब-कब आणा होई रे,
ईण मानखा जन्म रे माही रे,
कर लेना खरी कमाईं रे।।
एक दिन नर तेरा जन्म हुआ था,
घर दरवाजे ढोल गुरा था,
सहिया मिल मंगल गाई के,
घर घर में बंटी बधाई रे,
कर लेना खरी कमाईं रे,
ले लेणा बहुत भलाई रे,
तेरा कब-कब आणा होई रे,
ईण मानखा जन्म रे माही रे।।
हां छोटा था जब लाड लडाया,
माता ने तुमको दूध पिलाया,
बड़ा हुआ मारण को आया,
हां पर नारी रे कारणे,
हां पर नारी के कारणे,
नर करता मान बडाई रे,
कर लेना खरी कमाईं रे,
ले लेणा बहुत भलाई रे,
तेरा कब-कब आणा होई रे,
ईण मानखा जन्म रे माही रे।।
हां नर कहता है मेरी मेरी,
जग में कौन वस्तु है तेरी,
सिर पर खड़ी कालवी तेरी,
नर अंतकाल फिर रोवेगो,
कहां गए बाप और माई,
कहा गये बाप और भाई,
कर लेना खरी कमाईं रे,
ले लेणा बहुत भलाई रे,
तेरा कब-कब आणा होई रे,
ईण मानखा जन्म रे माही रे।।
हां एक दिन नर तेरा मरणा वेला,
हां सारा भेद बताणा वेला,
हां नर करी जैसी तुम पाएगा,
धिन सुखराम जस गाय के,
कर लेना खरी कमाईं रे,
ले लेणा बहुत भलाई रे,
तेरा कब-कब आणा होई रे,
ईण मानखा जन्म रे माही रे।।
कर लेणा खरी कमाई रे,
ले लेणा बहुत भलाई रे,
तेरा कब-कब आणा होई रे,
ईण मानखा जन्म रे माही रे,
कर लेना खरी कमाईं रे।।
स्वर – सुखदेव जी महाराज।
प्रेषक – कुलदीप सिंह ओसियां।
९४६८५८६२५३








