शिव गौरा साथ साथ,
भूत पलित आस पास,
भस्मी अघोरा उड़ावे रे,
देखो शिवजी होली मनावे रे,
म्हारा शिवजी होली मनावे रे।।
पेलो रंग श्री गणेश जी खेले,
मात पिता का चरण सरोहे,
दिव्य जगत की होली निराली,
नर नारी सबको मन मोहे,
वी तो केसर सूंड से उड़ावे रे,
म्हारा शिवजी होली मनावे रे।।
दूसरों रंग मां गौरा खेले,
लालन पे ममता उड़ेले,
नव शक्ति का नौ रंग जग में,
मां की किरपा बणी ने फैले,
वा तो लाल गुलाल उड़ावें रे,
म्हारा शिवजी होली मनावे रे।।
तीसरो रंग नंदीगण खेले,
शिव परिवार का पांव पखेरे,
जटा से निकली गंगाजी को,
जल पावन ले सिंग से बिखेरे,
वी तो चमक-अबीर उड़ावे रे,
म्हारा शिवजी होली मनावे रे।।
चौथो रंग आकाश से टपके,
ब्रह्मा विष्णु लीला दरसे,
नारद ऋषि मुनी योगी ध्यानी,
तप साधन अपणु सब खरचे,
वी तो आनंद रस बरसावे रे,
म्हारा शिवजी होली मनावे रे।।
पांचवों रंग है दीन दयाल को,
साधु संतन का प्रतिपाल को,
श्वेताम्बर पीतांबर धारी श्री,
भूत भावन मुण्डमाल को,
वी तो भंग को रंग जमावे रे,
म्हारा शिवजी होली मनावे रे।।
‘विप्रवर’ फागण को है केणु,
मन उमंग बसई ने रखणु,
बड़ी मुसकिल से पायो हमने,
रंग -रंगीलो जीवन अपणु,
अरे दूर उदासी भगाओ रे,
म्हारा शिवजी होली मनावे रे।।
शिव गौरा साथ साथ,
भूत पलित आस पास,
भस्मी अघोरा उड़ावे रे,
देखो शिवजी होली मनावे रे,
म्हारा शिवजी होली मनावे रे।।
निर्देशन – डॉ. सतीश गोथरवाल।
8959791036
लेखक – पंडित संजय शर्मा “विप्रवर”








