म्हारा घर का तड़ी तूँबड़ा,
अरे म्हारा रे घर का बोरिया बिस्तर,
थारे भरोसे रे,
म्हारा कोटड़ी वाला,
पार लगादे म्हारी नैया डोले रे।।
जग बन्यों है बेरी मा सू,
बैर निभावे रे,
छल कपट कर,
चाला चाले,
मने गिरावे रे,
हार गयो मैं आज साँवरिया,
हार गायो मैं आज साँवरिया,
अब तू ही जितावे रे,
म्हारा कोटडी वाला,
पार लगादे म्हारी नैया डोले रे।।
दिन रात मैं मेहनत करके,
घर चलाऊँ रे,
रूखों सूखो जो बन पूगे,
थारे भोग लगाऊ रे,
म्हारी रोज़ी को कुन दुश्मन होग्यों,
म्हारी रोज़ी को कुन दुश्मन होग्यों,
अब तुहि जाने रे,
म्हारा कोटडी वाला,
पार लगादे म्हारी नैया डोले रे।।
म्हारा घर का तड़ी तूँबड़ा,
अरे म्हारा रे घर का बोरिया बिस्तर,
थारे भरोसे रे,
म्हारा कोटड़ी वाला,
पार लगादे म्हारी नैया डोले रे।।
गायक – प्रदीप रीठ।
लेखक – ओमिश चौधरी।
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