एक दिन ब्रह्मा विष्णु शंकर,
बैठे सोच विचार में,
जग का प्राणी नहीं दुःखी है,
हम भी दुःखी संसार में।।
ब्रह्मा जी यूं कहने लगे है,
सुनो बात मेरी धर ध्यान,
मेरी पत्नी सरस्वती जी,
मूढ मती को देती ज्ञान,
वो नर हो जाता अभिमानी,
वीणा के उस तार में,
जग का प्राणी नहीं दुखी है,
हम भी दुःखी संसार में।।
अब बारी मेरी है आई,
विष्णु जी यूं बोल रहे।
चोर उचक्के पापी के घर,
लक्ष्मी जी यूं डोल रहे,
कहीं जुवारी के संग जाए,
कहीं चले उधार में,
जग का प्राणी नहीं दुखी है,
हम भी दुःखी संसार में।।
इन दोनों की बातें सुनकर,
भोले जी का है कहना,
मोर नाग मूषक नंदी का,
मेरे घर पर है रहना,
सिंह गर्जना कारण देखो,
फूट डली परिवार में,
जग का प्राणी नहीं दुखी है,
हम भी दुःखी संसार में।।
नारद मुनि जी छिपकर बैठे,
सामने आकर मुस्काए,
देवलोक में बतलाऊंगा,
मुंह उत्तर उनके आए,
‘मितु पण्डित’ नारद जी ने,
किया मखौल ये प्यार में,
जग का प्राणी नहीं दुखी है,
हम भी दुःखी संसार में।।
एक दिन ब्रह्मा विष्णु शंकर,
बैठे सोच विचार में,
जग का प्राणी नहीं दुखी है,
हम भी दुःखी संसार में।।
गायक व लेखक – मितु पण्डित, भिवानी।
प्रेषक – प्रदीप सिंघल, दिल्ली।








