घनश्याम कहे या राम कहे,
तुम रूप अनूप दिखाते हो,
कब धनुष बाण धर आते हो,
कब मुरली मधुर बजाते हो।।
है वास तुम्हारा घट घट में,
सब जग को नाच नचाते हो,
फिर भी यशोदा के हाथों से,
तुम उखल से बंध जाते हो,
घनश्याम कहें या राम कहें,
तुम रूप अनूप दिखाते हो।।
जग के स्वामी तुम हो मालिक,
हम दीन तुम्हारे सेवक है,
तुम ही केवट घर जाकर के,
खुद अपने चरण धुलाते हो,
घनश्याम कहें या राम कहें,
तुम रूप अनूप दिखाते हो।।
घनश्याम कहे या राम कहे,
तुम रूप अनूप दिखाते हो,
कब धनुष बाण धर आते हो,
कब मुरली मधुर बजाते हो।।
स्वर – श्री अंकुश जी महाराज।
प्रेषक – ओमप्रकाश पांचाल उज्जैन मध्य प्रदेश।
9926652202








