गणा की इज्जत धुला में मिलगी,
दोहा – परनारी मीठी छुरी,
तीन ठोड़ से खाय,
जीवता खावे कालजो,
मरिया नरक ले जाय।
परनारी के कारने,
मर गया रावण शिशपाल,
परनारी त्याग दे मूर्ख,
मिट जावे तेरा काल।
गणा की इज्जत धुला में मिलगी,
परनारी का छाला में,
गणा के माथे केस चाल रिया,
गणा सड रिया ताला में।।
सात जनम की कसमा खावे,
रूप देख कर रीज रिया,
मोटा घरा को बारो निकलग्यो,
भरिया समंद भी खाली विया,
एक दूजा ने काट फेंक दे,
लादे लास वा नाला में,
घणा की इज्जत धुला में मिलगी,
परनारी का छाला में।।
गणी हवेलियां जाती देखी,
परनारी का चक्कर में,
घर को मिटो मावो खिला दे,
जीव पराई शक्कर में,
ज्यों चालो ज्यों उलझे अनुतो,
ज्यों मकड़ी जाला में,
घणा की इज्जत धुला में मिलगी,
परनारी का छाला में।।
पाप छुपायो छुपे कोयने,
घड़ो पाप को फूट रियो,
पेली जीव ने ठाणे राकतो,
आबे का छाती कूट रियो,
मन ऊपरली माला फेरतो,
कई सार वा माला में,
घणा की इज्जत धुला में मिलगी,
परनारी का छाला में।।
टेटू बनाके चाम बिगड़े,
बनायो जाने भूल रियो,
बिना धोया रंग उड़ा दे,
कसया घमंड में घूम रियो,
कहे जगदीश प्रहलाद समझले,
नही दोष रखवाला में,
घणा की इज्जत धुला में मिलगी,
परनारी का छाला में।।
घणा की इज्जत धुला में मिलगी,
परनारी का छाला में,
गणा के माथे केस चाल रिया,
गणा सड रिया ताला में।।
गायक – चंपा लाल प्रजापति।
मालासेरी डुंगरी।
सम्पर्क सूत्र – 8947915979
(चारभुजा लाइव कालियास भागचन्द शर्मा)








