मोह में फंसा है प्राणी,
चार दिन का मेला है,
आना भी अकेला है,
जाना भी अकेला है।।
कोड़ी कोड़ी माया जोड़ी,
इसका क्या ठिकाना है,
माटी का शरीर तेरा,
माटी हो जाना है,
मोह में फंसा है प्राणी,
चार दिन का मेला है,
आना भी अकेला हैं,
जाना भी अकेला है।।
जितना भी कमाया तूने,
यही रह जाएगा,
गाड़ी धन दौलत तेरे,
साथ नहीं जाएगा,
मोह में फंसा है प्राणी,
चार दिन का मेला है,
आना भी अकेला हैं,
जाना भी अकेला है।।
मोह में फंसा है प्राणी,
चार दिन का मेला है,
आना भी अकेला है,
जाना भी अकेला है।।
स्वर – श्री अंकुश जी महाराज।
प्रेषक – ओमप्रकाश पांचाल उज्जैन मध्य प्रदेश।
9926652202








