नहीं टूटे दूध के दन्त,
दोहा – ससुर ने झगड़ा मोल लिया,
छल करके वन में खैल किया,
हर लाये जनक की जाई,
मेरी अर्ज सुनो रघुराई।।
नहीं टूटे दूध के दन्त,
उमर मेरी कैसे कटे बाली,
कैसे कटे बाली,
उमर मेरी कैसे कटे बाली।।
पहली तो पीहर की मारी,
दूजी राम ने विपदा डारी,
तीज़ी पिया लक्ष्मण ने मारी,
चौथी गोद खाली,
उमर मेरी कैसे कटे बाली,
नहीं टूटे दूध के दंत,
उमर मेरी कैसे कटे बाली।।
आम पके निंबुआ गदराए,
अनार तो सुरखी पर आये,
तोड़न की जब हुई तैयारी,
रूठ गया माली,
उमर मेरी कैसे कटे बाली,
नहीं टूटे दूध के दंत,
उमर मेरी कैसे कटे बाली।।
ससुरो रावण कब का बैरी,
सुतो सिंह जगा गया जहरी,
सत्यानाश इनका हो जाओ,
मोहे विधवा कर डारि,
उमर मेरी कैसे कटे बाली,
नहीं टूटे दूध के दंत,
उमर मेरी कैसे कटे बाली।।
गढ़ लंका के बीच हवेली,
जब जागु तब रहु अकेली,
नारायण मन हर्षित सुलोचन,
सती होवन चाली,
उमर मेरी कैसे कटे बाली,
नहीं टूटे दूध के दंत,
उमर मेरी कैसे कटे बाली।।
नहीं टूटे दूध के दंत,
उमर मेरी कैसे कटे बाली,
कैसे कटे बाली,
उमर मेरी कैसे कटे बाली।।
स्वर – रमेश जी दधीच।
प्रेषक – रवि कुमार साहु।
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